Thursday, February 19, 2026

"सुनो फ़रहीन... तुम आना जरूर... " - भोपाल की यादों पर एक कविता

फ़रहीन, तुम आना ज़रूर... सुनो फ़रहीन, मुद्दतों बाद ही सही, पर एक बार तुम आना, इन सर्द हवाओं का हाथ थाम कर, अगली हिज़री के बद्र के दिन, भोपाल शहर की उस पुरानी सी रूहानी फिज़ा में। मिल बैठेंगे हम ताजुल मस्जिद की उन चौड़ी सीढ़ियों पर, जहाँ मस्जिद के झरोखों में वक्त भी ठहर कर सुस्ताता है, जहाँ ऊंची गुंबदों की पाकीजगी में सुकून मुस्कुराता है। कर लेंगे दिल की कुछ अधूरी बातें वहाँ बैठकर, और खोलेंगे उन तमाम गिले-शिकवों की पोटली, जो बरसों से दबी हैं हमारे ज़हन में... और कर लेंगे हमारी उन मजबूरियों का भी हिसाब। मैं तुम्हारी ख़ामोशियाँ पढ़ूँगा, और तुम मेरी आँखों की नमी पढ़ना। ढलती दोपहरी में दूर, बड़ी झील का वो मंजर, जब सूरज इंतज़ार कर रहा होगा शाम का और मस्जिद से अज़ान की पाक गूँज हवाओं में घुलेगी, तब न कोई दुनिया का डर होगा, न कोई बंदिश। बस मैं होऊँगा, तुम होगी, और वो पुराना सा सुकून। हम बातें करेंगे; उन खतों की जो कभी डाक तक नहीं पहुँचे, उन वादों की जो दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए, और उस अधूरेपन की भी, जिसे हमने 'ज़िन्दगी' मान लिया। फ़रहीन, तुम आना ज़रूर... ताकि हम अपनी मोहब्बत को एक पूरे-पन का नाम दे सकें। सुनो फ़रहीन, तुम आना तो अपने साथ वो पुरानी हंसी भी लाना, हम ताजुल मस्जिद की सीढ़ियों से उतरकर, वीआईपी रोड से कोहेफिज़ा की उस ढलती मोड़ तक चलेंगे। जहाँ बड़े तालाब का पानी, सूरज की आखिरी किरण को चूमता है, वहाँ बैठकर हम उन पलों को याद करेंगे... वो चटोरी गली की रौनक और हमारी बेफ़िक्र बातें। वो गौहर महल की नक्काशी में छिपे हमारे अधूरी ख़्वाब। और वो क़शमकश, जिसने हमें 'हम' से 'मैं' और 'तुम' कर दिया। यूं नक्शे पे तो बस छोटा सा शहर है भोपाल, पर तुम्हारी यादों के घेरे में यह किसी महाद्वीप से कम नहीं है। वहाँ हम उन मजबूरियों पर हँसेंगे भी और शायद थोड़ा रोएंगे भी, कि कैसे भोजताल की लहरों जैसी हमारी मोहब्बत, किनारे तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ गई। हम पूछेंगे उन रास्तों से, जो साथ चलने थे। हम ढूंढेंगे वो 'वक़्त' जो हमारे कभी थे ही नहीं। और आखिर में, बस एक-दूसरे को जी भर कर निहार लेंगे। फ़रहीन, तुम आना ज़रूर... भले ही विदा होते वक़्त हम मुसाफ़िर हों, पर ताजुल मस्जिद की उन सीढ़ियों पर हम सिर्फ 'एक' होंगे। फ़रहीन, तुम आना ज़रूर... जब शाम गहराने लगेगी और मस्जिद के मीनारों पर चाँद दस्तक देगा, तब हम अपनी मजबूरियों को वहीं उन सीढ़ियों पर छोड़ देंगे। जैसे पुराने शहर की दीवारों से रंग झड़ते हैं, वैसे ही हम अपने गिले-शिकवे वहीं झाड़ देंगे। हमारा मिलना शायद मुकद्दर न सही, पर एक खूबसूरत इत्तेफाक तो रहेगा। कर लेंगे एक खामोश समझौता; हम फिर अजनबी बन जाएंगे, पर इस बार दिल में कोई बोझ नहीं होगा। भर लेंगे दुआ का रंग अपनी अपनी ज़िंदगी के बचे टुकड़ों में। मैं तुम्हें जाते हुए देखूँगा, और तुम पीछे मुड़कर मत देखना। कि ताजुल मस्जिद की वो सीढ़ियाँ गवाह रहेंगी, कि एक ढलती शाम में दो मुसाफ़िर मिले थे, दुनिया को भुलाने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को माफ़ करने के लिए। फ़रहीन... जब तुम जाओगी, मुझे अलविदा कहोगी, तो अपने साथ वो यादें ले जाना जो तुम्हें मुस्कुराने की वजहें दें, और मुझे वो तन्हाई दे जाना, जिसमें अब कोई 'गिला-शिकवा' न बचा हो। फ़रहीन, तुम आना ज़रूर... बस एक आखिरी बार, भोपाल शहर की उसी पुरानी सुकून की खातिर। - विजय रात्रे (19 फरवरी 2026)